हमारी जीवंत संस्कृति और परंपरा के प्रति समाज और हमारे देशवासियों की विडंबना।

हम सभी जानते हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति, परंपरा और विरासत कई शताब्दियों पहले की है। यह विशाल और जीवंत है। हमने अपनी संस्कृति और परंपरा को शुरू से ही महत्व दिया है और इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए खूबसूरती से संरक्षित किया है और आगे भी करते रहेंगे।
आज यह सुनकर बहुत हीं घात व दुख होता है कि आज की हमारी युवा पीढ़ी अपने वतन के संस्कार , परिवेश, रीतियाँ तथा सभ्यता से दूर होते जा रहे हैं।
वे प्रतिकूल पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता को स्वीकार करने में लगे हुए हैं जो हमारी सामाजिक छवि को धूमिल कर रहा है और पूर्वजों की द्वारा दिये गये संस्कृति की अव्हेलना कर रहे है।
हमारी सांस्कृतिक विरासत हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने कितनी प्रगति की है और हम कितनी दूर तक पहुँचने की योजना बना रहे हैं, हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को कभी नहीं भूल सकते क्योंकि वे हम में अंतर्निहित हैं और हमारे लिए एक अविभाज्य हिस्सा हैं।
नैतिकता और मूल्य हमारी भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और हमारी जीवन शैली कुछ ऐसी है जो निरंतर और अपरिवर्तित बनी हुई है। आप इन मूल्यों को हर भारतीय के दिल में गहराई से उलझा हुआ पाएंगे।
मुझे पता है कि मैं हमारी युवा पीढ़ी और विकास क्षेत्रों के प्रति एक आलोचक हूं।
लेकिन यह इसलिए है क्योंकि मैं इस  का खंडन कर कह रहा हूं कि यहां युवा पीढ़ी को नैतिक मूल्यों, मानवीय मूल्य, और सामाजिक मूल्यों पर पाठ नहीं पढ़ाया जा रहा है, जैसे कि कथा, धार्मिक, प्रथाएं, त्योहारों का उत्सव, रीति-रिवाज और परंपराएं आदि। युवा पीढ़ी को सभी क्षेत्रीय सीमाओं को मिटाने के लिए प्रेरित और हर महिला, पुरुषों, छोटे और बुजुर्गों का सम्मान करना सिखाया जाता था।
आज के समय में, हमारे युवाओं का झुकाव हमारे मूल कर्तव्यों से अलग हो रहा है।
यदि हम विश्लेषण करें, तो हमें पता चलता है कि 3-4 दशक पहले की युवा पीढ़ी अपने परिवार, गांव, संस्कृति, रीति-रिवाजों और देश से काफी जुड़ी हुई थी।
लेकिन आज का दृश्य कुछ और है जहां तक ​​मैं समझता हूं, हमारे सभी शैक्षणिक संस्थानों को शिक्षा के सभी स्तरों पर नैतिक अध्ययन को अनिवार्य बनाने की आवश्यकता है। और यह देखा जाना चाहिए कि जब भी हम अपने इतिहास के बारे में बात करते हैं और अपनी विरासत पर चर्चा करते हैं, तो सभी योग्य पुरुष, महान संत, हमारे पीछे विभिन्न धर्मों के महान अनुयायियों ने हमें अपने देश, सभ्यता, संस्कृति से प्रेम तथा उसके प्रति कर्तव्यनिष्ठ एवं उदार रहने था निःस्वार्थ सेवा भाव रखना सिखया है।


ये विचार मेरे खुद के हैं,अगर इस लेखनी में किसी प्रकार की त्रुटि अथ्वा कोई चूक हुई हो तो ज़रूर।
Comment कर के कृतार्थ करे जिससे हमें अपने ग़लतियों को सुधार ने का अवसर प्राप्त होगा।

आपका ANGEL उर्फ मेहुल

Comments

Popular Posts from Authors.

जो चेहरे पहरे के सरताज होते है। :- Niru

WHEN I FIRST MET HER :-VINEET (26MAY 2020)